संशयात्मक काया(sansatmak Kaya)part5

में प्रचार किया और आज पचास करोड़ से अधिक मनुष्य इस उपदेश के महान् साधन के महत्व की जीवित साक्षी विद्यमान
है। शंकर, ईसा, मुहम्मद डारविन आदि अनेक पुरुषों ने मौखिक और लिखित उपदेश से ही काम लिया है । उपदेश के इस
महत्व को स्वयं महर्षि दयानन्द ने सत्यार्थप्रकाश' की भूमिका में इस प्रकार वर्णन किया है-'सत्योपदेश के बिना अन्य
कोई भी मनुष्य जाति की उन्नति का कारण नहीं है।'
मैडम साहिबा के नाम एक पत्र में उनके इस प्रकार वचन लिखे हैं जिनसे भी उपदेश के महत्व का बोय हो
रहा है-'हम आर्यों और आर्यसमाजों की कदापि हानि नहीं है हम लोग जब से सृष्टि और वेद का प्रवाशहा है. उसी
समय से आज पर्यन्त उसी बात को मानते आते हैं। क्या हुआ कि अब थोड़े समय से अपनी अज्ञानता और उतम उपदेश
के बिना बहुत से आर्य वेदोक्त मंत्र से कुछ-कुछ विरुद्ध और बहुत से अनुकूल आचरण भी करते हैं। अब जिसकी प्रसन्नता
हो अपनी और सबकी उन्नति के लिये इस आर्य समाज में मिलें ।


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सत्यार्थ प्रकाश के ग्यारहवें समुल्लास में महर्षि लिखते हैं-'इस बिगाड़ के मूल महाभारत युद्ध से पूर्व एक सहन
वर्ष से प्रवृत्त हुये थे क्योंकि उस समय में तपि-मुनि भी थे तथापि कुछ-कुछ आलस्य, प्रमाद, ईर्ष्या, द्वेष के अंकुर ठग मे,
वे बढ़ते-बढ़ते बढ़ गये जब सच्चा उपदेश न रहा तब आर्यावर्त में अविद्या के फैलने से परस्पर लड़ने-झगड़ने लगे,क्योकि
जब-जब उत्तम उपदेशक होते हैं तब-तब अच्छे प्रकार धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सिद्ध होते हैं और जब ठत्तम ठपदेशक
और श्रोता नहीं रहते तब अन्ध परम्परा चलती है। जब सत्पुरुष उत्पन्न हो कर सत्योपदेश करते है तभी अन्ध परम्परा नष्ट
होकर प्रकाश की परम्परा चलती है।

'लीवर' के प्रयोग को दृष्टांत-'लीवर' का प्रयोग करने वाले बुद्धिमान् कारीगर बड़े भारी बोझों को सरलता से
उठा सकते हैं और लीवर का यह सिद्धांत मनुष्य की भुजा में ही पाया जाता है एक दार्शनिक ने लीवर को उठाने की
अदभुत शक्ति को गौरव दिलाने के लिये कहा था कि मुझे पर्याप्त सामग्री और लीवर दे दो; मैं पृथिवी को उठा सकता
हूं।' यह कथन तो अवश्य अत्युक्ति है परन्तु जब हम यह कहें कि सत्योपदेश मनुष्यजाति को ऊपर उठाने का एक अचूक
और अत्यन्त शक्तिशाली लीवर है तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं । ऐसे शक्तिशाली उपदेश रूपी लीवर को लिये हुये
महर्षि गिरी हुई मनुष्य जाति को उठाने का यत्न करता रहा और अन्त में सफल हुआ।

स्वामी जी के लिखित व मौखिक उपदेशों का फल उनके मीखिक उपदेश का फल यदि आर्यसमाजे है तो
लिखित उपदेश का फल उनकी रचनायें हैं । मौखिक उपदेश वे अपने जीवन में ही हमें सुना सकते थे परन्तु उनकी रचनायें
आज उन मौखिक उपदेश के स्थान पर काम कर रही हैं। इस समय संसार उनके भाषण को नहीं सुन सकता परन्तुरचनाओं
को पढ़ सकता है । सच पूछो तो उनकी पुस्तकें ही आज हमें उनकी ओर से उपदेश देती हुई स्वस्ति और शान्ति का वेदमार्ग
दर्शा रही हैं।

सत्य सनातन सिद्धांत-इससे पूर्व कि हम उन सिद्धांतों का वर्णन करें जिनकी उन्होंने लिखित शिक्षा दी है. यह
वर्णन करना आवश्यक है कि ये सिद्धांत उनके अपने मन से घड़े हुये या नवाविष्कृत नहीं है, अपितु प्रकृति के समकालीन
हैं और उतने ही प्राचीन हैं। इन सिद्धांतों का आधार ईश्वरीय ज्ञान वेद है। इनका दूसरा नाम 'वैदिक-सत्य-सिद्धांत' है।
ये सब सच्चे सिद्धांत हैं जिनको मनुष्यजाति आदि सृष्टि से लेकर महाभारत के काल तक मानती रही है। ब्रह्मा से लेकर
जैमिनि मुनि तक जितने ऋषि, महर्षि मुनि, महामुनि पृथ्वी पर हुये, सब एकमत होकर मानते रहे यही नहीं प्रत्युत ये वे
सत्य सिद्धांत हैं जिनको अब भी बुद्धमान् लोग मान रहे हैं और भविष्यकाल में भी मानेंगे। इन सिद्धांतों की जोव केल
सत्य पर है। सृष्टि नियम इनकी सच्चाई का अचूक गवाह (साक्ष) है। ये किसी विशेष जाति या सम्प्रदाय के सिद्धांव नहीं
ये ईरान, चीन, भारतवर्ष आदि किसी देश की चारदीवारी में बंधे रहने वाले सिद्धांत नहीं और न ही ये हिन्द मुसलमान,
ईसाई, यहूदी, पारसी, जाना आदर कसा मत या सम्प्रदाय के सिद्धांत है। जैसे संसार के लिये एक ही वायु, एक ही जल, एक
मर्य लाभ पहुंचाने वाला ह, वस मनुष्य मात्र के लिये ये एक ही आत्मिक सर्य के समान है। सचाई से समस्त संसार
सहमत हो सकता हादा आर द का चार समस्त संसार कहने को तैयार है। सब देशों में लोग सप्ताह के सात दिन और
१२ महीने मानते हैं सब स्थान पर लोग शान्ति की इच्छा करते हैं। ठीक इसी प्रकार इन वैदिक सिद्धांतों के स्वीकार
करने के लिये प्रत्येक मनुष्य प्रकृति की ओर से तैयार बनाया गया है। आंख सर्य के प्रकाश के लिये तैयार है, आत्मा सबाई
की इच्छुक है । वैदिक सचाई प्रकृति को जीवित पुस्तक की व्याख्या है। इन सिद्धांतों की वास्तविकता समझने के लिये
प्रत्येक मनुष्य को विचार की दृष्टि से महर्षि के निम्नलिखित शब्दों का अध्ययन करना चाहिये-'सर्वतत्र सिद्धांत अ्थात्
साम्राज्य सार्वजनिक धर्म जिसको सदा से सब मानते आये, मानते है ओर मानेंगे भी इसीलिये उसको सनातन नित्यधर्म
कहते हैं कि जिसका विरोधी कोई भी न हो सके यदि अविद्यायक्त जन अथवा किसी मतवाले के भ्रमाये हुये जन, जिसको
अन्यथा जाने वा माने उसका स्वीकार कोई भी बुद्धिमान नहीं करते किन्तु जिसको आप्त अर्थात् सत्यमानी, सत्यवादी,
सत्यकारी, परोपकारक, पक्षपात रहित विद्वान मानते हैं वह सबको मन्तव्य और जिसको नहीं मानते वह अमन्तव्य होने से
हैं जिनको भी मानता हूँ सब सज्जन महाशयों के सामने प्रकाशित करता है। मैं अपना मन्तव्य उसी को जानता हूँ जो
प्रमाण के योग्य नहीं होता । अब जो वेदादि सत्य शास्त्र और ब्रह्मा से लेकर जैमिनि मनि पर्यन्तों के माने हुये ईश्वरादि पदार्थ
तीन काल में सबको एक सा मानने योग्य है । मेरा कोई नवीन कल्पना व मतमतान्तर चलाने का लेशमात्र भी अभिप्राय नहीं
है किन्तु जो सत्य है उसका मानना मनवाना और जो असत्य है उसको छोड़ना और छड़वाना मुझको अभीष्ट है । यदि में
पक्षपात करता तो आर्यावर्त में प्रचरित मतों में से किसी एक मत का आग्रही होता किन्तु जो जो आर्यावर्त व अन्य देशों में
अधर्मयुक्त चालचलन उनका स्वीकार और जो धर्मयुक्त बाते हैं उनका त्याग नहीं करता न करना चाहता हूं क्योंकि ऐसा
करना मनुष्य धर्म से बहिः है। मनुष्य उसीको कहना कि जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख दुःख और हानि लाभ
को समझे, अन्यायकारी बलवान से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे, इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामर्च्य
से धर्मात्माओं की चाहे वे महाअनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों उनको रक्षा, उनति प्रियाचरण और अधर्मी चाहे
चक्रवर्ती, सनाथ, महाबलवान और गुणवान भी हों तथापि उसका नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात्
जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारी के बल की उन्नति सर्वथा किया करे इस काम
में चाहे उसको कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भले ही जावे परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवे ।"

सार्वभौम सचाइयां-जिन सिद्धांतों की वे शिक्षा देते रहे उनका दूसरा नाम सार्वभौम सचाइयाँ हैं । इनको ही हम
वेदोक्त सिद्धांत कहते हैं। इन्हीं को स्वामी जी स्वयं मानते और दूसरों को मनवाते थे इन्हीं का उपदेश वे अपनी रचनाओं
में कर गये हैं। यह जान लेने के पश्चात् कि वे सार्वभौम सिद्धांतों की शिक्षा देते रहे, अब हमें नमूने के रूप में उन सिद्धांतों
से परिचय प्राप्त करना आवश्यक है।

सबसे प्रथम उन्होंने पथभ्रष्ट संसार को ईश्वर के विषय में वेदोक्त शिक्षा दी जिह्वा भोजन को बखती हुई उस
को स्वीकार करती है परन्तु विष के चखने पर उसको कदापि स्वीकार नहीं करती। आमाशय जहां अन को पचा लेता है।
वहां विष को वमन या अतिसार के द्वारा निकालता हुआ अपनी घृणा प्रकट करता है। कान यदि राग की सुरीली वाणी को

1. 'सत्यार्थ प्रकाश, पृष्ठ ५९९-६०० (तृतीयावृत्ति)।
संशयात्मक काया(sansatmak Kaya)part5 संशयात्मक काया(sansatmak Kaya)part5 Reviewed by BestMobile on July 31, 2019 Rating: 5

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