संशयात्मक काया(sansatmak Kaya)part4

स्वामी जी ने अपनी बनाई संस्थायें क्यों तोड़ दी?-स्वामी जी उस संस्था के साथ सम्बन्ध रखते थे जिससे
उनका उद्देश्य पूर्ण होता रहे। यदि वे देखते थे कि कोई संस्था हमारे उद्देश्य को पूर्ण नहीं करती तो वे स्वयं ही उसके विरोधी
है।
और उसको तोड़ने वाले हो जाते थे फर्रुखाबाद आदि स्थानों की पाठशालायें इस बात को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त
दृष्टांत हैं। यद्यपि इन पाठशालाओं में अष्टाध्यायी, महाभाष्य आदि आर्ष अन्य उत्तमता से पढ़ाये जाते थे परन्तु जब विद्यार्थी
आर्ष ग्रन्थ पढ़ने पर भी पौराणिक ही बनकर निकलने लगे तो स्वामी जी ने इन शालाओं को स्वयं तोड़ देना ही ठचित
समझा। इससे हमें जानना चाहिये कि कोई संस्था जो स्वामी जी के उद्देश्य पूर्ण करने का साधन नहीं हैं वह उनका कभी
स्मारक नहीं कहला सकती सम्भव है मनुष्य किसी संस्था का नाम सुनकर उसको महर्षि का स्मारक समझ लें परन्तु इस
बात का निश्चय करने के लिये कि यही स्मारक है, मनुष्य को उस संस्था के उद्देश्य और कार्यवाही की पड़ताल कर लेनी
चाहिये। हम ब्राह्मण का नाम सुनकर किसी विशेष पुरुष के सम्मान के लिये उद्यत हो जाते हैं परन्तु उसके ब्राह्मण नाम को
छोड़कर उसके काम की पड़ताल करें तो फिर निश्चय हो सकता है कि वास्तव में यह ब्राह्मण है या नहीं । इसी प्रकार किसी
महात्मा के सच्चे स्मारक को जानने के लिये हमें उसके नाम को छोड़कर उस उपदेश-शिक्षा को देख लेना चाहिये जो उसमें
दिया जाये। इस वर्णन से यह सिद्ध है कि सच्चा स्मारक किसी उद्देश्य की पूर्ति का साधन हुआ करता है और इस सिद्धांत
को समझते हुए
हम
पाते हैं कि आर्य समाज जहां महर्षि के नाम का स्मरण कराने वाला है, वहां उनके उद्देश्य की पूर्ति का
निस्संदेह प्रबल और सबसे श्रेष्ठ साधन है।


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ईंट-पत्थर किसी का स्मारक नहीं बन सकते-पंडित गुरुदत्त जी अपने व्याख्यानों में कहा करते थे कि ईंट-पत्थर
पर किसी ऋषि का नाम खुदवा देने से ऋषि का स्मारक नहीं बन सकता; प्रत्युत यदि ऋषि का स्मारक स्थापित करना चाहते
हो तो उन सिद्धांतों का प्रचार करके दिखाओ जिन सिद्धांतों का प्रचार स्वयं वे ऋषि करते रहे हैं। स्वामी दयानन्द का स्मारक
यही है कि वेद के सिद्धांतों का संसार में प्रचार हो जाये।'

ऋषि का वसीयतनामा क्या कहता है-यदि स्वामी जी अपना वसीयतनामा न छोड़ते तो कदाचित् कोई कह
सकता कि हमें स्वामी जी का उद्देश्य विदित नहीं, परन्तु जब उनका वसीयतनामा विद्यमान है तो कोई भी ऐसा कहने का
साहस नहीं रखता । यह वसीयतनामा बता रहा है कि यदि स्वामी जी कुछ काल और जीते तो निम्नलिखित उद्देश्यों की
पूर्ति के लिये अपना समय लगाते।

स्वामी जी के वसीयतनामे में लिखा उनका उद्देश्य
(१) वेद और वेदांग आदि शास्त्रों के प्रचार अर्थात् उनकी व्याख्या करने-कराने, पढ़ने-पढ़ाने, सुनने-सुनाने,
छापने-छपवाने आदि में।

(२) वैदिक धर्म के उपदेश और शिक्षा के लिये उपदेशक मंडली नियत करके देश-देशान्तर और द्वीप-द्वीपान्तर
में भेज कर सत्य का ग्रहण और असत्य के त्याग कराने आदि में ।

(३) आ्यावर्त के अनाथ और दरिद्र मनुष्यों के पालन और शिक्षा में इस सभा का कोष प्रयुक्त किया जावे।
महर्षि के इस उद्देश्य को पूर्ण करने के लिये आर्य समाज का अस्तित्व है इसलिये आर्यसमाज के अतिरिक्त
कोई भी अन्य उनका सच्चा स्मारक नहीं है आर्य समाज में सम्मिलित होने के लिये स्वयं महर्षि लोगों को बला रहे हैं।
आर्यसमाज ऐसा शुभ स्मारक है कि इसकी नींव का पत्थर स्वयं महर्षि ने अपने हाथों से रखा है। इस स्मारक की कीर्ति

1.देखो सत्यार्थ प्रकाश',पृष्ठ ३८६
संसार भर में फैली हुई है। आर्यसमाज को वृद्धि से वेदधर्म की उन्नति हो सकती है। कभी वह दिन भी आयेगा जब कि
भूगोल के सब द्वीपों में आर्य समाज रूपी वृक्ष की शाखायें स्थापित होंगी। वह दिन आवेगा जबकि उपदेशक मंडली' की
दृढ़ नीव स्थापित करने के लिये पुरुषार्थ करते है महर्षि को वसीयत को पूरा करने से कपिसन्तान कहलाने के अधिकारी
हो सकेंगे। स्वामी जी का जीवन यदि साथ देता तो वे स्वयं इस उपदेशक मंडली' को अत्यन्त आकर्षक अवस्था में कर
जाते परन्तु उन्होंने गौरीशंकर शर्मा को वैदिक धर्म सभा. जयपुर का वैतनिक उपदेशक नियत करके इस महान कार्य को दृढ
जीव स्वयं डाली थी। अब इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये आर्यसमाजों ने वेदप्रचार फंड स्थापित किया है ताकि देश-देश
और नगर-नगर में वैदिक धर्म का प्रकाश फैलाकर अविद्यान्धकार का नाश कर सके।

यदि कलकत्ते की एशियाटिक सोसाइटी के सदस्यों के कारण यूरोप को प्राचीन शास्त्रों क महत्व का लेशमात्र
बोध हुआ तो इस सोसाइटी से कई गुणा बढ़ाकर आर्यसमाज के सदस्यों के कारण यूरोप, अमरीका आदि सब देशों को
वेद आदि सत्य शास्त्रों की महिमा का पूर्ण बोध न होगा? यदि आज पाश्चात्य लोग एशियाटिक सोसाइटी के आभारी है
तो कल इससे बढ़कर आर्यसमाज और उसके संस्थापक महर्षि दयानन्द के आभारी होंगे।

अध्याय ७

महर्षि की रचनायें और वैदिक शिक्षा
ऋषियों के शिक्षा-साधन-स्वामी जी के जीवन के दो भाग है.एक वह चल जिसमें अमर जीवन का यह अन्वेषक
अमृत के स्रोत की खोज में फिरता रहा और दूसरा वह भाग जिसमें अमृतपान कर लेने के पश्चात् मनुष्यमात्र को इस अमृत
को देने का या करता रहा। दोनों भागों में हम उन्हें पुरुषार्थ करते हुये पाते हैं। पहले भाग में अपने लिये और दूसरे में
औरों के लिये। दोनों भागों में हम उन्हें यात्रा करता पाते हैं दोनों भागों में हम उन्हें कष्टं की चट्टानों से घिरा हुआ पाठे हैं।
पहले भाग को यदि बीज कहें तो दूसरा भाग उसका फल है। दोनों में हम उन्हें सफल होता देखते हैं। पहले भाग में यदि
उनके साधन ब्रह्मचर्य और योग थे तो दूसरे भाग में हम उनको वाणी और लेख के साधन काम में लाता पाते हैं। यदि पहले
साधन उन्नति के साधन थे तो पिछले साधन प्रचार के साधन हैं। यदि कोई प्रश्न करे कि महर्षि ने अन्तिम भाग में लिखित
या मौखिक उपदेश के काम को हाथ में क्यों लिया, क्यों इसके अतिरिक्त और कोई उत्तम साधन न थे तो हम कहेंगे कि
जैसे उन्नति के ब्रह्मचर्य तथा योग अद्वितीय और पूर्ण साधन हैं वैसे ही संसार की काया पलटने के लिये मौखिक और
लिखित उपदेश के साधन पूर्ण और अद्वितीय हैं। मौखिक उपदेश वह परम उत्तम साधन है जिसको प्राचीन समय में
आश्रम के शिरोमणि संन्यासी लोग ग्रहण किया करते थे और इस उपदेश के बल पर सब मनुष्यों का कल्याण करते थे।
ऋषि लोग जहां मौखिक उपदेश करते थे वहां आवश्यकतानुसार लिखित उपदेश भी करते रहे हैं। क्या महर्षि पाणिनि की
अष्टाध्यायी, महर्षि पतंजलि का योगदर्शन, ब्रह्मवेत्ता ऋषियों को उपनिषद, शतपथ आदि ब्राह्मण निरुक्त, निघण्टु आदि
पुस्तकें उनके लिखित उपदेश का फल नहीं है?

अन्धकार युग में ज्ञान-प्रचार के साधन-ऋषियों के काल को छोड़कर हम अन्धकार-युग में भी दीपक का प्रकाश
फैलाने वालों को इन दो ही साधनों को व्यवहार करते हुये पाते हैं । बुद्ध ने इसी उपदेश के बल से धर्म के साधनों का संसार

2'साइंस आफ लैंग्वेज' (Science of Language) पृष्ठ २२० । सर विलियम जोन्स,विलकिन्स,केरी, फारस्टर, कोलबुक
आदि एशियाटिक सोसाइटी के सदस्य हैं जिन्होंने संस्कृत के कोषों का संकेत पाश्चात्य संसार को दिया

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