संशयात्मक काया(sansatmak Kaya)part3

शाम भी-अमरीका सरीखे दर देशों में चले जाओ, वहां भी आर्यसमाज के साथ स्वामी दयाल
स्वामी दयानन्द के साथ आर्यसमाज का नाम बंधा हुआ पायेंगे अमरीका के विद्वान डेविस' अपने लेख में स्वामी दयानन्द
से आर्यसमाज को पृथक नहीं कर सकते। जड़ां वे स्वामीजी को शुद्ध अग्नि में प्रज्ज्वलित करने वाला-यह गौरवपूर्ण नाम
देते हैं, वहां वे 'आर्य समाज को उसे अग्नि की भट्टी बतलाते हैं। यदि अमरीका में बैठे हुये थियोसोफिस्ट स्वामी जी को
अपना सहायक बनाते हैं तो वे थियोसोफिकल सोसाइटी को स्वामी दयानन्द के आर्यसमाज की शाखा साथ ही चोषिर
करत हा मैक्समूलर अपनी पुस्तक में स्वयं यह प्रश्न उठाता है कि 'दयानन्द सरस्वती कौन था?' और फिर स्वयं ी
तारक दयानन्द सरस्वती'"आर्य समाज' का संस्थापक और नेता था। संसार में बहुत लोग कूप, तालाच सगळ
आर मकान बनवाते हैं इसलिये कि ईट और पत्थर उनके नाम का स्मरण कराते रहाजा वस्तु किसी के नाम को स्परणका
सक वह उसका स्मारक समझी जाती है और इन अर्थों में आर्यसमाज से बढ़कर स्वामी दयानन्द का कोई रमारक नहीं

सकता।

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वास्तविक स्मारक स्मरणीय के उद्देश्य का प्रचारक होता है परन्तु यह नियम नहीं है कि जो चीज किसी
नाम का किसी प्रकार स्मरण करा सके वह उसका स्मारक समझी जाती है । प्रत्युत वास्तव में स्मारक वह है जो किसी महान
आत्मा के उद्देश्य और सिद्धांत के प्रचार करने से उसका स्मरण करा सके । यह अभीष्ट नहीं है कि स्मारक से स्मरणीय का
कोई साधारण काम ही स्मरण हो सके, अपना स्मारक स्मरणीय के उस विशेष काम का प्रचारक समझा जाता है जिस काम
का कोई (स्मरणीय) महापुरुष अपने जीवन में करता रहा हो। उदाहरणार्थ, यदि कोई प्रोफेसर डाण्टन के नाम पर एक प्याड
चालू कर दे या लोगों को लड्ड बांटने आरम्भ कर दे तो वह कार्यालय, जिसमें लड्डु बनते या बंटते हो, सर्वसाधारण के लिये
डाण्टन का स्मारक हो और कदाचित् उस कार्यालय के भीतर डाण्टन का चित्र भी विद्यमान हो परन्तु विचारशील उसको
डाण्टन का स्मारक नहीं कह सकते । इसमें सन्देह नहीं कि लडु बांटना अच्छे काम में सम्मिलित है परन्तु यह काम विज्ञान
के प्रचारक डाण्टन के उद्देश्य से सम्बन्ध न रखता हुआ उसका स्मारक नहीं कहला सकता । स्मारक वह वस्तु होनी चाहिये
कि जो अपने उद्देश्य द्वारा उसका बोध करा सके जिस का वह स्मारक है दूसरे शब्दों में स्मारक में उस महान् पुरुष का
उद्देश्य पूर्ण होना चाहिए। यदि कोई ऐसी शाला हो जिसमें यह शिक्षा दी जाये कि मनुष्य क्रमश: लंगूर से मनुष्य के रूप
में बदलता गया, तो निस्सन्देह लोग कहेंगे कि यह शाला डारविन का श्रेष्ठ स्मारक है । किसी महात्मा के उद्देश्य के विरुट
या उद्देश्य को पूर्ण न करने वाला स्मारक उस महात्मा के जीवन को कलंक लगा सकता है। उदाहरणार्थ, यदि कोई गिरजा
बैडला के नाम पर बनाया जाये, परन्तु ध्यान से देखें तो यह स्मारक जो बैडला के उद्देश्य के विरुद्ध है उसको कलंकित करने
वाला है। लोग उस शिक्षा को जो कि गिरजा में दी जाये, सुनकर भूल से कह सकते हैं कि बैडला भी इसी प्रकार ीवर
में बाइबिल का प्रचार करता रहा होगा यद्यपि वह बाइबिल की शिक्षा का घोर विरोधी था इसी प्रकार यदि कणाद या
पतंजलि महर्षि के नाम पर कोई अंग्रेजी शाला चालू कर दे तो यह शाला कणाद और पतंजलि का स्मारक नहीं कहता
सकती; भले ही इन महर्षियों का नाम उस शाला के साथ क्यों न लगा हो

नाम जुड़ा होने पर भी स्मारक-किसी महात्मा के उद्देश्य को पूर्ण करता हुआ कोई कार्यालय उस महात्मा की
स्मारक कहला सकता है, अन्यथा कदापि नहीं । यह आवश्यक नहीं कि उस कार्यालय के साथ महात्मा नाम भी हो ।
यदि नाम नहीं और उद्देश्य पूर्ण हो रहा है तो संसार निस्सन्देह उसको स्मारक कहता है कि जैसे कि आर्यसमाज । यरे
उसके साथ महर्षि दयानन्द का नाम नहीं लगा हुआ, परन्तु महर्षि के उद्देश्य को पूर्ण करने से उनका स्मारक बन रहा है।

1. मैक्समूलर 'बायो माफी ऐसेज' (Biographical Essays) पृष्ठ

संशयात्मक काया(sansatmak Kaya)part3 संशयात्मक काया(sansatmak Kaya)part3 Reviewed by BestMobile on July 31, 2019 Rating: 5

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