संशयात्मक काया(sansatmak Kaya)

पूर्णयोगी और शास्त्र पारंगत-पूर्ण ब्रह्मचारी और पूर्ण योगी होने के कारण ही वे समस्त विद्याओं में पर्णता

निपुण थे । 'भ्रान्ति निवारण' में उनके वचन कि "मैं अपने निश्चय और परीक्षा के अनुसार बर्वेद से लेकर पूर्वमीमांसा
अनुमान स तान हजार ग्रन्थों के लगभग मानता हं"-बतला रहे हैं कि उनका अध्ययन कहा तक विस्ततभा
तीन हजार के लगभग प्रमाणित ग्रन्थ मानते हैं तो आश्चर्य नहीं कि उन्होंने उससे दुगने अन्य पढ़े हो । यही नहीं कि वे
व्याकरण के पंडित थे, प्रत्युत ज्योतिष, गणित, कार्य पदार्थ विद्या, वैद्यक आदि सर्वविद्याओं के श्रेष्ठ सिद्धांतों को भली-भांति
जानत आर उन विद्याओं की ऊंची से ऊची संस्कृत की प्रामाणिक पुस्तकें पढ़े हुये थे । कोई मनुष्य ठीक रूप से पूर्ण विद्वन
हुये बिना वेदों का भाष्य करने को समर्थ नहीं हो सकता और जब उन्होंने ऋषियों के ढंग पर वेदों का भाष्य किया तो
निस्सन्देह वह पृथिवी से लेकर ईश्वर पर्यन्त सर्वविद्याओं के मूलरूपी सिद्धांतों को योगदृष्टि से निर्भान्त जानते थे यदि
मिस्टर हबट स्पैन्सर फिलास्फर हैं तो क्या वह वर्तमान विज्ञान के सिद्धांतों से शून्य है । यदि मनुष्यश्रेणी के एक फिलास्फर
के लिये समस्त विद्याओं के सिद्धांतों को जानना आवश्यक है तो
क्या
पूर्ण ब्रह्मचारी और पूर्ण योगी के लिये सर्व विद्याओं
का निभ्रान्त जानना कठिन है? हम उनको ज्ञान, कर्म और उपासना रूपी गुणों के हिमालय की चोटी पर बैठा हुआ पाते हैं।
संसार उनके अस्तित्व में ऋषि शब्द का लक्षण पढ़ रहा है। पूर्ण उन्नत आत्मा, पूर्ण उन्नत शरीर के साघन से परोपकार
करता हुआ उनके उदाहरण से दृष्टि पड़ रहा है। उनकी उच्च दशा को देखते हुये प्रश्न उठता है कि वे किन साधनों से ऐसी
उच्च अवस्था को प्राप्त हुये, उनका जीवनचरित्र उत्तर देता है कि "पूर्ण ब्रह्मचर्य और पूर्ण योग।"


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अध्याय ४

पी और अमेरिका के प्रतिनिधि का संशय मिटाना
मौन शिक्षा से मनीषी गुरुदत्त का कायाकल्प-स्वामी जी ने जिन सार्वभौम वैदिक सिद्धांतों का प्रवार और
उपदेश किया, उस उपदेश ने जहां सर्वसाधारण और संस्कृत जानने वालों को आर्य बनाया वहां उसने कई अंग्रेजी के विद्वानों
को भी आर्य बिना दिया। उनके जीवन में ही अनेक पुरुष आर्यधर्म के महत्त्व को समझ गये थे परन्तु मृत्युंजय की मृत्यु का
पंडित गुरुदत्त सरीखे अंग्रेजी-विज्ञान के पूर्ण विद्वान् की संशयात्मक काया को न बोले पलटा देना अत्यंत आश्चर्यदायक
बात है। यूरोप और अमेरिका के वर्तमान श्रेष्ठ विचारों का प्रतिनिधि यदि हम पंडित गुरुदत्त एम०ए० को कहें तो उचित
है। रात-दिन मिल, हक्सले, टिण्डल, डार्विन, स्पैन्सर आदि अनेक यूरोपियन विद्वानों के ग्रन्थों के पठन तथा मनन द्वारा
जिसने उनके विचार मन में धारण किये हुये थे, उसको योगिराज की मृत्यु पर ही इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण मिला कि किस
प्रकार एक सच्चा आस्तिक और पूर्ण योगी मृत्यु के भय से रहित होकर, ईश्वरोपासना के परम बल से क्लेश की जड़ को
काटता हुआ, प्रसन्नतापूर्वक परलोक गमन करता है । इस विचित्र मृत्यु ने पंडित गुरुदत्त को ईश्वर की सत्ता का अत्यन्त ही
प्रबल प्रमाण दे दिया इस मृत्यु ने (पश्चिमी विचारों के) उस प्रतिनिधि को स्पष्ट जतला दिया कि योगी ही मृत्यु पर विजय
पा सकते हैं। उस वेद सूर्य की महत्ता का जिसका उपदेश मृत्युंजय अपने जीवन में करता था. पंडित जी को विश्वासी बनाते
है उनके मुख से कहला दिया कि वर्तमान पश्चिमी विज्ञान और दर्शनशास्त्र की जहां समाप्ति होती है वहां वेद-विद्या का
आरम्भ होता है। इसी घटना ने संसार को क्रियात्मक रूप में दिखला दिया कि वेदों के महान ज्ञान को ग्रहण करने के लिये

1 स्वामी जी अंग्रेजी,फारसी आदि बिलकुल नहीं पढ़े हुये थे।
2 मृत्यु पर विजय प्राप्त करने वाला अर्थात् स्वामी दयानन्द सरस्वती जो।
किस प्रकार प्रथम श्रेणी के विद्वान् एम० ए० विद्यार्थी बनते हैं। हमें यह नहीं समझना चाहिये कि पंडित गुरुदत्त को ऋषि की
मृत्यु ने पूर्ण आर्य बना दिया प्रत्युत गहरी दृष्टि से देखें तो यूरोप और अमरीका के विद्वानों के प्रतिनिधि के संशय मिटा दिये
जिसके सूक्ष्म अर्थ यह है कि यूरोप और अमेरिका के विज्ञान और दर्शन के सिद्धांतों ने वैदिक सूर्य की शरण ली। यदि
ऋषि ने प्रकट किये हुये वैदिक सिद्धांत एक गुरुदत्त के संशय निवृत्त करते हुये उसको शानति दे सकते हैं तो इसके अर्थ ये
है कि वैदिक सिद्धांत यूरोप और अमेरिका की संशयात्मक काया को तत्काल पलटा देते हुये शान्ति प्रदान कर सकते हैं।
यदि कोई भारतनिवासी जो पौराणिक मत का विश्वासी है अंग्रेजी दर्शन को पढ़कर पौराणिक भ्रान्तियों को अपने मन से
दूर कर देता है तो उसके ये अर्थ है कि अंग्रेजी दर्शन पुराणों की शिक्षा पर विजयी होता है। यदि अंग्रेजी कालिजों के
विद्यार्थी पौराणिक गणों को नहीं मानते तो इससे स्पष्ट प्रकट होता है कि अंग्रेजी का प्रकृतिपूजक दर्शन पौराणिक गप्पों से
कहीं बढ़कर है । इसी प्रकार यदि अंग्रेजी दर्शन शास्त्र के विशेषज्ञ सच्चे हृदय से वैदिक सिद्धांतों की शरण लेते हैं तो उससे
यह परिणाम निकालना कि वैदिक सिद्धांत पश्चिमी सिद्धांतों पर विजय पाते हैं, कुछ कठिन नहीं । यदि पश्चिमी विज्ञान
और दर्शन शास्त्रों के प्रकाण्ड पंडित गुरुदत्त ने वेदों की शरण ली तो इसके स्पष्ट अर्थ यह है कि यूरोप और अमरीका ने
वेदों का आश्रय लिया।

अध्याय ५
महर्षि के उद्देश्य और अमेरिका के विद्वान् की निष्पक्ष सम्मति
शोक पत्रों की बाढ़ आ गई-प्रेम से मनों को वश में करने वाले परोपकारी की मृत्यु का समाचार सुनकर कौन
पुरुष था जिसने सचमुच रक्त के आंसू न बहाये हों जिन लोगों ने उनके दर्शन किये, उनका उपदेश सुना या उनकी लिखित
पुस्तकें देखी थीं, वे उनकी मृत्यु का समाचार सुनने पर आश्चर्य और शोक के समुद्र में डूब रहे थे पांच हजार वर्ष के
पश्चात पृथ्वी की पुरानी राजधानी आर्यावर्त को महर्षि को उत्पन्न करने का सौभाग्य मिला था परन्तु कर्मगति ने इस
सौभाग्य को छीन लिया। कहां वृद्ध आर्यावर्त अपने सपूत के यश को सुनकर प्रसन्न हो रहा था और कहां उसको उसके
वियोग का दिन देखना पड़ा। महर्षि की मृत्यु कोई साधारण मृत्यु न थी। चारों ओर से हदयों की उद्विग्नता से भरे तार और
शोक पत्र अजमेर पहुंच रहे थे । इन तारों और पत्रों की भारी संख्या उस भारी दुःख को प्रकट करती है जो कि भारत सन्तान
ने उनकी मृत्यु पर अनुभव किया था। समाचार पत्र 'देश हितैषी' अजमेर में लिखा है कि -"हमारे पास इतने शोकपत्र और
तारों की भरमार हुई है कि यदि हम उनको वर्ष भर तक इस 'देशहितैषी' पत्र में मुद्रित किये जावें तो भी समाप्त न हों। यहां
के तार बाबू बारम्बार यही कहते थे कि ऐसे कौन दयानन्द सरस्वती हैं जिसके इतने तारों के मारे हमको एक क्षण भी अवकाश
नहीं मिलता। इतने तार तो कभी लाट साहब के समय में भी देखने में नहीं आये।"

योगी दयानन्द को अपनी मृत्यु का पूर्वाभास था-समाचार पत्र 'थियोसोफिस्ट' ने उनके परलोकगमन का
समाचार सुनते ही अपना यह लेख प्रकाशित किया-"हमारे संवाददाता चकित हैं कि क्या स्वामी दयानन्द जैसे योगी को,
जिसमें कि योगविद्या की शक्तियां विद्यमान थीं, इस बात की पहले सूचना न थी कि आपकी मृत्यु से भारतवर्ष को महान
हानि पहुंचेगी। क्या वे योगी न थे, क्या वे ब्रह्मर्षि नहीं थे ? हम शपथ लेकर कहते हैं कि स्वामी जी को अपनी मृत्यु की
सूचना दो वर्ष पहले ही से थी। उनके वसीयतनामे की दो प्रतिलिपियां, जो कि उन्होंने कर्नल आल्काट और मुझ पत्रिका
संशयात्मक काया(sansatmak Kaya) संशयात्मक काया(sansatmak Kaya) Reviewed by BestMobile on July 31, 2019 Rating: 5

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